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हाल ही में पाकिस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमला हुआ, जिस बात की आशंका काफ़ी समय से सभी को थी, अन्ततः वह बात सच साबित हुई कि पाकिस्तान का सत्ता प्रतिष्ठान, आईएसआई, तालिबान, लश्कर आदि सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं, यानी कि चोर-चोर मौसेरे भाई। इसी प्रकार पाकिस्तान में क्रिकेट भी एक सट्टे का रूप है, यह बात काफ़ी वर्षों से सभी लोग जानते हैं कि पाकिस्तान की सत्ता में रहने वाले दाऊद के बेहद करीबी हैं। दाऊद के हजारों धंधों में से एक है क्रिकेट पर सट्टा लगाना, खिलाड़ियों को खरीदना और मैच फ़िक्स करवाना। इस धंधे में भारत और पाकिस्तान के कई खिलाड़ी शामिल रहे हैं और उनकी घनिष्ठता इतनी बढ़ी है कि दाऊद ने जावेद मियाँदाद को अपना समधी भी बना लिया, मोहम्मद अज़हरुद्दीन के पाकिस्तानी क्रिकेटरों से काफ़ी करीबी सम्बन्ध रहे हैं, और मुशर्रफ़ के हालिया भारत दौरे के समय अज़हरुद्दीन उनसे भी गलबहियाँ कर रहे थे।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में कांग्रेस ने हैदराबाद सीट से पूर्व् क्रिकेटर अजहरुद्दीन को टिकट देने का फ़ैसला लगभग कर ही लिया है। एक तरफ़ तो राहुल बाबा पार्टी में शुद्धता आदि की बातें कर रहे हैं और साफ़ छवि वाले युवाओं को मौका देने की “लाबिंग” कर रहे हैं ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर मुस्लिम वोटों की लालच में कांग्रेस को अज़हरुद्दीन जैसे दागी क्रिकेटर (वे अभी भी पूरी तरह से पाक-साफ़ घोषित नहीं हुए हैं) की जरूरत क्यों आन पड़ी है? यह वही अज़हरुद्दीन हैं जो क्रिकेट से बाहर का दरवाजा दिखाये जाने और जेल जाने की नौबत आने के तुरन्त बाद प्रेस से मुखातिब होते हुए बोले थे कि “चूंकि वे अल्पसंख्यक हैं इसलिये उन्हें फ़ँसाया गया है…” हालांकि बाद में मीडिया के दबाव में उन्होंने वह कथन वापस ले लिया था, लेकिन उनकी “मानसिकता” तत्काल उजागर हो गई थी। एक बार एक इंटरव्यू में दाऊद इब्राहीम ने भी कहा है कि वे तो भारत में आत्मसमर्पण करना चाहते हैं लेकिन चूंकि भारत की न्याय व्यवस्था पर उन्हें यह भरोसा नहीं है कि उन्हें उचित न्याय(?) मिलेगा, इसलिये वे समर्पण नहीं करेंगे…। एक और छैला बाबू हैं सलमान खान, हिरण के शिकार के मामले में जब वे जोधपुर जेल जाने को हुए, उन्होंने भी तुरन्त मुसलमानों की सफ़ेद जाली वाली टोपी पहन ली थी… आखिर यह कैसी मानसिकता है और इन सभी के विचारों(?) में इतनी समानता कैसे है? जबकि यही वह देश है, जहाँ आज भी अफ़ज़ल गुरु मस्ती से चिकन चबा रहे हैं, आज भी अबू सलेम आराम से अपनी प्रेमिका से बतिया रहे हैं, आज भी धरती का बोझ अब्दुल करीम तेलगी महंगा इलाज ले रहा है, आज भी शहाबुद्दीन संसद में ठहाके लगा रहे हैं, आज भी सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर पर सेकुलर लोग “स्यापा” कर रहे हैं, और अब अज़हरुद्दीन भी हमारी छाती पर मूंग दलने आ पहुँचे हैं… ऐसे में इस महान देश से ज्यादा महफ़ूज़ ठिकाना कौन सा हो सकता है?
अज़हरुद्दीन के मामले पर सीबीआई अभी जाँच कर रही है, ऐसे में कहीं उनके कांग्रेस में शामिल होने की कोई गुप्त शर्त तो नहीं है? क्या इसका मतलब यह लगाया जाये कि कांग्रेस अबू सलेम को भी आज़मगढ़ से टिकट दे सकती है? सुप्रीम कोर्ट हाल ही में बेशर्म कांग्रेस को सीबीआई का दुरुपयोग करने हेतु सरेआम डाँट लगा चुकी है, लेकिन कोई असर नहीं। सीबीआई की विभिन्न रिपोर्टों में साफ़-साफ़ उल्लेख है कि अज़हरुद्दीन दाऊद के दो खास आदमियों अनीस इब्राहीम और अबू सलेम के सतत सम्पर्क में थे। शारजाह में होने वाले मैच खासतौर पर फ़िक्स किये जाते थे, क्योंकि वह इलाका भी दाऊद के लिये “घर” जैसा ही है। पाठकों को भारतीय क्रिकेट टीम के फ़िजियो डॉ अली ईरानी भी याद होंगे, वे गाहे-बगाहे मैचों के बीच में किसी न किसी बहाने मैदान के बीच पहुँच जाते थे और बतियाते रहते थे, आखिर ऐसा बार-बार क्यों होता था? सीबीआई की 162 पृष्ठों की एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है कि किस तरह से अंडरवर्ल्ड का पैसा अज़हरुद्दीन के मार्फ़त घूम-फ़िरकर माफ़िया के हाथों में वापस पहुँचता था। कुख्यात बुकी मुकेश गुप्ता और हांसी क्रोन्ये के बयानों से भी साबित हुआ था कि क्रिकेट मैच सट्टे और फ़िक्सिंग में दाऊद गैंग गले-गले तक सक्रिय है। अभी-अभी उत्तरप्रदेश के एक और डॉन बबलू श्रीवास्तव ने कहा है कि वे और अज़हरुद्दीन लगभग एक जैसे ही हैं, लेकिन अज़हरुद्दीन सिर्फ़ इसलिये जेल से बाहर हैं क्योंकि उनके दाऊद से मधुर सम्बन्ध हैं। इस बयान का बहुत गहरा मतलब है, आज की तारीख में अज़हरुद्दीन हैदराबाद के जिस पॉश इलाके बंजारा हिल्स में रहते हैं, वहाँ कड़ी सुरक्षा व्यवस्था होती है और मुम्बई पुलिस की एक खुफ़िया रिपोर्ट आने के बाद वहाँ “शार्प शूटर्स” की तैनाती भी की गई है, भला एक “पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी” को इतनी भारी-भरकम सुरक्षा व्यवस्था की क्या आवश्यकता है? हालांकि बबलू ने कहा है कि अज़हरुद्दीन को जान का कोई खतरा हो ही नहीं सकता, क्योंकि उनके सभी “भाई” लोगों से मधुर सम्बन्ध हैं। जब अबू सलेम पुर्तगाल में आज़ादी से घूमता था उस वक्त सीबीआई ने अज़हरुद्दीन को किये गये उसके कई फ़ोन कॉल्स ट्रेस किये थे (दिव्या चावला की रिपोर्ट देखें)।
कोई न कोई अन्दरूनी बात है जो कि अभी खुलकर सामने नहीं आ रही है और अब अज़हरुद्दीन के कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद ऐसा कुछ सामने आने की सम्भावना भी कम होती जा रही है। “जय हो…” के कॉपीराइट खरीदने की बजाय कांग्रेस 25-50 साफ़ छवि वाले उम्मीदवार ही खड़े कर दे तो शायद देश का कुछ भला हो…
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