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महिला दिवस, शोभा डे और सीता सेना… (एक अभद्र और


World Women’s Day, Shobha De, SITA Sena

हालांकि महिला दिवस पर शोभा डे और खुशवन्त सिंह जैसों के बारे में कुछ लिखना एक कड़वा अनुभव होता है, लेकिन ये “पेज-थ्री हस्तियाँ”(?) अपनी “गिरावट” से मजबूर कर देती हैं कि उनके बारे में कुछ लिखा जाये। जैसा कि सभी जानते हैं शोभा डे नाम की एक “पोर्न लेखिका” भारत के “प्रगतिशील तबके”(?) में मशहूर हैं, अधिकतर अंग्रेजी में ही सोचती, बोलती और लिखती हैं, उन्होंने राम सेना के अत्याचारों के विरोध में महिला दिवस यानी 8 मार्च को नई दिल्ली में “सीटी बजाओ” अभियान का आयोजन किया है और अपनी इस किटी पार्टी सेना को नाम दिया है “सीता सेना”। जी हाँ, राम सेना के विरोध में उन्हें सीता सेना नाम ही सूझ पाया। एक तो यह हिन्दू नाम है और दूसरा इस नाम का “प्रोपेगंडा” करके सेकुलरों की जमात में और भी गहरे पैठा जा सकता है। यदि वे “फ़ातिमा सेना” या “मदर मैरी सेना” जैसा नाम (अव्वल तो रख ही नहीं पातीं) रखतीं और इंडिया गेट पर किसी प्रकार की लेक्चरबाजी करतीं तो उनका सिर फ़ूटना तय था। ये मोहतरमा इतनी महान और प्रगतिशील लेखिका हैं कि इनके हर तीसरे लेख में ‘S’ से शुरु होने वाला अंग्रेजी का तीन अक्षरों का शब्द अवश्य मौजूद होता है, सो बिक्री भी बहुत होती है, ठीक खुशवन्त सिंह की तरह, जो दारू और औरत पर लिखने के मामले में उस्ताद(?) हैं। मैडम का संक्षिप्त सा परिचय इस प्रकार है - शोभा राजाध्यक्ष, जिनका जन्म जनवरी 1947 में हुआ, ये एक मराठी सारस्वत ब्राह्मण हैं। इनके दूसरे पति दिलीप डे हैं और फ़िलहाल ये अपने छः बच्चों के साथ मुम्बई में निवास करती हैं।

भई हम तो ठहरे “साम्प्रदायिक”, “फ़ासिस्ट” “पिछड़े” और “दकियानूसी” लोग, इसलिये मैडम को हम सिर्फ़ सुझाव दे सकते हैं कि इंडिया गेट पर जमने वाली इन महिलाओं के इस झुण्ड को ये “शूर्पणखा सेना” का नाम भी तो दे सकती थीं…।

उधर एक और महिला हैं साध्वी प्रज्ञा, जो कि जेल में भोजन में अंडा परोसे जाने के कारण कई दिनों से भूख हड़ताल पर हैं, उनकी हालत नाजुक है और कोर्ट ने कहा है कि उन्हें अस्पताल में भरती किया जा सकता है (यह कोर्ट ही तय करेगा, भले ही साध्वी की हालत कितनी ही खराब हो जाये, कोई महिला संगठन उनके पक्ष में सामने नहीं आयेगा)। साध्वी प्रज्ञा जी को यह बात समझना चाहिये कि खाने में अण्डा दिये जाने जैसी “छोटी सी बात” पर इतना नाराज़ होने की क्या आवश्यकता है? क्या उन्हें पता नहीं कि “हिन्दुओं की धार्मिक भावना” नाम की कोई चीज़ नहीं होती? इसलिये सरेआम “सीता सेना” भी बनाई जा सकती है, और कोई भी पेंटर हिन्दुओं के भगवानों की नग्न तस्वीरें बना सकता है।

अब महिला दिवस पर इतने बड़े-बड़े लोगों के बारे में लिख दिया कि “फ़ुन्दीबाई सरपंच” (यहाँ देखें) जैसी आम और पिछड़ी महिलाओं के बारे में लिखने की क्या जरूरत है?

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