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पाकिस्तान से 1600 करोड़ रुपये से ज्यादा लेना निकलता


Pakistan Owes Rs 300 crore for 60 years

आपने अक्सर खबरों में पढ़ा होगा कि अलाँ-फ़लाँ बैंक के गुर्गे किसी कर्जदार के घर मारपीट करके उससे बैंक की उधारी/कर्जे की रकम लेकर आते हैं। गत 60 साल से एक कर्जदार भारत की छाती पर मूँग दल रहा है, है कोई माई का लाल जो उससे वसूल कर सके? जी हाँ वह कर्जेदार और कोई नहीं, हमारा पड़ोसी, हमारा छोटा भाई(?), हमारा गलेलगू-छुराघोंपू मित्र पाकिस्तान ही है। एक समाचार (यहाँ देखें) के अनुसार 1948-49 से लेकर आज तक भारत के प्रत्येक बजट में बारीक अक्षरों में एक लाइन लिखी होती है “विभाजन के समय हुए समझौते के अनुसार पाकिस्तान से हमारे हिस्से के 300 करोड़ रुपये लेना बाकी”।

असल में विभाजन के समय यह तय किया गया था कि फ़िलहाल दोनों देशों की जो भी संयुक्त अन्तर्राष्ट्रीय देनदारियाँ हैं वह भारत चुका देगा (बड़ा भाई है ना), फ़िर अपनी हिस्सेदारी का 300 करोड़ रुपया पाकिस्तान 3% सालाना ब्याज की दर से 1952 से शुरु करके पचास किश्तों में भारत को वापस करेगा। आज तक “छोटे भाई” ने एक किस्त भी जमा नहीं की है (इस प्रकरण में किसी और ब्लॉगर को अधिक विस्तारित जानकारी मालूम हो तो वह यहाँ टिप्पणियों में साझा कर मेरा ज्ञानवर्धन करें)।

पाकिस्तान को आज़ादी के वक्त भारत ने 55 करोड़ रुपये दिये थे, जो कि गाँधी के वध के प्रमुख कारणों में से एक था। सवाल यह उठता है कि आज तक इतनी बड़ी बात भारत की किसी भी सरकार ने किसी भी मंच से क्यों नहीं उठाई? अपना पैसा माँगने में शरम कैसी? जनता पार्टी और भाजपा की सरकारों ने इस बात को लेकर पाकिस्तान पर दबाव क्यों नहीं बनाया? (कांग्रेस की बात मत कीजिये)। हमने पाकिस्तान को 3-4 बार विभिन्न युद्धों में धूल चटाई है, क्या उस समय यह रकम नहीं वसूली जा सकती थी? या कहीं हमारी “गाँधीवादी” और “सेकुलर”(?) सरकारें यह तो नहीं समझ रही हैं कि पाकिस्तान यह पैसा आसानी से, बिना माँगे वापस कर देगा? (कुत्ते की दुम कभी सीधी होती है क्या?)।

300 करोड़ रुपये को यदि मात्र 3% ब्याज के आधार पर ही देखा जाये तो 60 साल में यह रकम 1600 करोड़ से ज्यादा होती है, क्या इतनी बड़ी रकम हमें इतनी आसानी से छोड़ देना चाहिये? इतनी रकम में तो एक छोटी-मोटी सत्यम कम्पनी खड़ी की जा सकती है, और चलो मान लिया कि बड़ा दिल करके, उन भिखारियों को हम यह रकम दान में दे भी दें तब भी क्या वे हमारा अहसान मानेंगे? छोटा भाई तो फ़िर भी कश्मीर-कश्मीर की रट लगाये रखेगा ही, ट्रेनों-नावों में भर-भरकर आतंकवादी भेजता ही रहेगा।

विभाजन की बहुत बड़ी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक कीमत भारत पहले ही चुका रहा है उस पर से यह एक और घाव!!! एक सम्भावना यह बनती है कि, असल में यह रकम पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्सों को मिलकर भारत को देना थी, लेकिन जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (यानी हमारा एक और सिरदर्द आज का बांग्लादेश) को आजाद करवाने में मदद देने का फ़ैसला किया और आज़ाद करवा भी लिया तो यह रकम डूबत खाते में चली गई, क्योंकि जब देनदारों में से एक इलाका खुद ही स्वतन्त्र देश बन गया, तो फ़िर कर्जा कैसा? और बांग्लादेश इस रकम में से आधा हिस्सा देगा, यह सोचकर भी हँसी आती है। इसमें पेंच यह है कि भारत ने तो सन् 1971 में बांग्लादेश को आजाद करवाया तो फ़िर सन् 1952 से लेकर 1971 की किस्त क्यों नहीं दी गई? चलो पाकिस्तान कम से कम उतना ही दे दे, लेकिन ऐसी कोई माँग करने के लिये हमारे देश के नेताओं को “तनकर सीधा खड़ा होना” सीखना पड़ेगा। “सेकुलरों” और “नॉस्टैल्जिक” बुद्धिजीवियों की बातों में आकर हमेशा पाकिस्तान के सामने रेंगते रहने की फ़ितरत छोड़ना होगी।

55 करोड़ रुपये का दूध “साँप” को फ़ोकट में पिलाने के जुर्म में गाँधी की हत्या हो गई, अब इस 1600 करोड़ को न वसूल पाने की सजा “नेताओं”(?) को देने हेतु कम से कम 40 नाथूराम गोड़से चाहिये होंगे, लेकिन जो देश “पब कल्चर” और “वेलेन्टाइन” में रंग चुका हो और अंग्रेजों द्वारा “झोपड़पट्टी का कुत्ता” घोषित होने के बावजूद खुशी मना रहा हो, ऐसे स्वाभिमान-शून्य देश में अब कोई गोड़से पैदा होने की उम्मीद कम ही है…

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