Slumdog Millionaire Oscar Award India Secularism
22 फ़रवरी को ऑस्कर पुरस्कार समारोह में भारत की अब तक की “सबसे महान फ़िल्म”(?) स्लमडॉग मिलियनेयर को ऑस्कर मिलने की काफ़ी सम्भावना है, उसके मजबूत “सेकुलर” कारण निम्नानुसार हैं –
1) क्योंकि फ़िल्म के निर्देशक एक अंग्रेज हैं। जबकि महबूब खान (मदर इंडिया) से लेकर आशुतोष गोवारीकर (लगान) तक के हिन्दी निर्देशक निहायत नालायक और निकम्मे किस्म के हैं।
2) “मदर इंडिया” को ऑस्कर इसलिये नहीं मिला क्योंकि उसमें भारतीय स्त्री द्वारा दिखाई गई नैतिकता “अंग्रेजों” को समझ में नहीं आई थी (उनके अनुसार बच्चों को भूख से बचाने के लिये उस औरत को पैसे के लिये लम्पट मुनीम की वासना का शिकार हो जाना चाहिये था, ये “नैतिकता”(?) अंग्रेजों में 40-50 साल पहले आ गई थी जबकि उनके गुलामों में “पब कल्चर” के रूप में अब यहाँ घर कर चुकी है), तथा “लगान” को ऑस्कर इसलिये नहीं मिला क्योंकि उसमें अंग्रेजों को हारते दिखाया गया था, जो कि “शासक मानसिकता” को रास नहीं आया। जबकि “स्लमडॉग” की सम्भावना इसलिये ज्यादा है कि इसमें “तरक्की के लिये छटपटाते हुए युवा भारत” को उसकी “औकात” बताने का प्रयास किया गया है।
3) “हिन्दू” बेहद आक्रामक और दंगाई किस्म के होते हैं, ऐसा भी फ़िल्म में दर्शाया गया है। हीरो मुसलमान है और हिन्दू दंगाई उसकी माँ की हत्या कर देते हैं, भीड़ चिल्लाती है “ये मुसलमान हैं इन्हें मारो… मारो…” और बच्चे चिल्लाते हैं “हिन्दू आ रहे हैं, हिन्दू आ रहे हैं भागो-भागो…” (कुल मिलाकर एक बेहद “सेकुलर” किस्म का सीन है इसलिये पुरस्कार मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वामपंथी नन्दिता दास की गोधरा दंगों पर बनी फ़िल्म को पाकिस्तान में पुरस्कार दिया गया है)। ![]()
4) फ़िल्म में भगवान राम का ऐसा भयानक काल्पनिक रूप शायद ही पहले किसी ने देखा होगा (जो चित्र यहाँ दिखाया गया है)।
5) मुस्लिम हमेशा “सेकुलर” होते हैं और “पीड़ित” होते हैं जो कि सिर्फ़ एक अंग्रेज निर्देशक ही भारत की मूर्ख जनता को बता सकता है, फ़िल्म में दोनो मुस्लिम लड़के सिर्फ़ सूरदास रचित कृष्ण के भजन ही गाते हैं (सेकुलरिज़्म की दाल में एक और तड़का)।
6) फ़िल्म पूरी तरह से “भारतीय” है, क्योंकि इसके निर्देशक डैनी बोयल अंग्रेज हैं, स्क्रीनप्ले सिमोन ब्यूफ़ोय का है जो अंग्रेज हैं, हीरो देव पटेल नाम के गुजराती हैं जिनका परिवार पहले नैरोबी और अब लन्दन में रहता है, मूल उपन्यास (Q & A) के लेखक एक पूर्व भारतीय राजनयिक हैं जो अब दक्षिण अफ़्रीका में रहते हैं, यह फ़िल्म भी “हू वांट्स टु बी मिलियनेयर” नामक टीवी शो पर आधारित है जो कि एक सफ़ल ब्रिटिश गेम शो है, यानी की पूरी-पूरी “भारतीय”(?) फ़िल्म है, उस पर तुर्रा यह कि मूल उपन्यास में हीरो का नाम है “राम जमाल थॉमस”, जिसे फ़िल्म में बदलकर सिर्फ़ जमाल रखा गया है, क्योंकि यही नाम “सेकुलर” लगता है…
तो भाईयों और बहनों, ऑस्कर पुरस्कार के लिये तालियाँ बचाकर रखिये… हम जैसे “विघ्नसंतोषी” आपका मजा नहीं बिगाड़ेंगे…इसका वादा करते हैं… सो ऑस्कर के लिये जय हो, जय हो…
अब मूल विषय से हटकर एक घटना :– अपुष्ट समाचार के अनुसार मुम्बई के मलाड इलाके में स्थित “हायपरसिटी मॉल” में एक पाकिस्तानी लड़की सबा नज़ीम (उम्र 22 वर्ष) को कुछ नाराज मुसलमानों की भीड़ ने बुरी तरह से पीटा। रियाज़ अहमद तालुकदार नामक शख्स, जो कि “जन सेवा संघ” नाम का एक NGO चलाते हैं, ने उस महिला की पीठ पर उर्दू में “शुक्र अलहम दुलिल्लाह” (यानी, अल्लाह तेरा शुक्रिया) छपा हुआ टैटू देखा, उसने अपनी माँ को फ़ोन किया और मिनटों में ही उस मॉल में दर्जनों महिलाओं ने उस पाकिस्तानी लड़की की सरेआम पिटाई कर दी, वह लड़की घबराकर अगले ही दिन पाकिस्तान लौट गई।
क्या इस घटना के बारे में आपने किसी अखबार में पढ़ा है? किसी न्यूज़ चैनल पर बड़ी बिन्दी वाली प्रगतिशील महिलाओं से इसके बारे में बहस सुनी है? क्या इस घटना को लेकर किसी महिला केन्द्रीय मंत्री ने “नैतिक झण्डाबरदारी” के खिलाफ़ कोई भाषण दिया है? क्या किसी अंग्रेजी पत्रकार ने उस NGO मालिक को गुलाबी चड्डियाँ भेजने का प्लान बनाया है? ट्रेन भरकर आजमगढ़ से दिल्ली आने वाले उलेमाओं में से किसी ने इसकी आलोचना की? यदि इन सबका जवाब “नहीं” में है, तो एक आत्म-पीड़ित, खुद पर तरस खाने वाले, स्वाभिमान-शून्य राष्ट्र को मेरा नमन…
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