Coordination between Church and Naxalites India
नक्सली कमाण्डर पांडा ने एक उड़िया टीवी चैनल को दी गई भेंटवार्ता में दावा किया कि स्वामी लक्ष्मणानन्द को उन्होंने ही मारा है। पांडा का कहना था कि चूंकि लक्ष्मणानन्द सामाजिक अशांति(???) फ़ैला रहे थे, इसलिये उन्हें खत्म करना आवश्यक था। जिस प्रकार त्रिपुरा में NFLT नाम का उग्रवादी संगठन बैप्टिस्ट चर्च से खुलेआम पैसा और हथियार पाता है, उसी प्रकार अब यह साफ़ हो गया है कि उड़ीसा और देश के दूरदराज में स्थित अन्य आदिवासी इलाकों में नक्सलियों और चर्च के बीच एक मजबूत गठबंधन बन गया है, वरना क्या कारण है कि इन इलाकों में काम करने वाली मिशनरी संस्थाओं को तो नक्सली कोई नुकसान नहीं पहुँचाते, लेकिन गरीब और मजबूर आदिवासियों को नक्सली अपना निशाना बनाते रहते हैं?
कुरेदने पर पांडा ने स्वीकार किया कि नक्सलियों के उड़ीसा स्थित कैडर में ईसाई युवकों की संख्या ज्यादा है, उन्होंने माना कि उनके संगठन में ईसाई लोग बहुमत में हैं, उड़ीसा के रायगड़ा, गजपति, और कंधमाल में काम कर रहे लगभग सभी नक्सली ईसाई हैं।
पांडा की इस स्वीकृति से दो सवाल उठते हैं, पहला तो यह कि लक्ष्मणानन्द की हत्या की जिम्मेदारी अब वे क्यों ले रहे हैं? सबसे पहले इन्हीं माओवादियों कहा कि हाँ हमने यह हत्या की है, फ़िर उनका बयान आया कि नहीं हम इस प्रकार की धार्मिक हत्याएं नहीं करते, और अब फ़िर एक इंटरव्यू आया कि हाँ हमने हत्या की है, आखिर क्या मतलब है इसका? असल में शायद पांडा को उड़ीसा के अन्दरूनी इलाकों में हिन्दुओं की इतनी तीव्र प्रतिक्रिया का अंदेशा नहीं था, और अब चूंकि उनके काडर में ही फ़ूट पड़ने की नौबत आ गई तो उन्हें यह जिम्मेदारी लेना सूझा। दूसरा, यह कि कहीं यह स्वीकृति मिशनरियों को हिन्दुओं के हमले से बचाने की साजिश तो नहीं? जिससे कि मिशनरियों को “पवित्र गाय” दर्शाया जाये। 
दूसरी तरफ़ देश में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग नाम का एक “पालतू बिजूका” भी है, जो तभी काम करता है जब किसी राज्य में मुस्लिम या ईसाईयों पर हमले और अत्याचार होते हैं। इस अल्पसंख्यक आयोग के लिये हिन्दू कहीं भी अल्पसंख्यक नहीं होते। जब भी किसी राज्य में जैसे नागालैण्ड, जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, वहाँ उन पर अत्याचार होते हैं, या फ़िर कश्मीर जैसे राज्य जहाँ से लगभग सभी हिन्दुओं को भगा दिया गया है, वहाँ इस आयोग के सदस्य झाँकने भी नहीं जाते। इस नकली आयोग को मिजोरम से भगाये जा रहे हिन्दू भी नहीं दिखते, इस आयोग को त्रिपुरा में शरणार्थी कैम्पों में रह रहे 30000 हिन्दू भी दिखाई नहीं देते। इन्हें चिन्ता होती है सिर्फ़ गुजरात और उड़ीसा की।
अब उड़ीसा में राष्ट्रपति शासन लगाने की माँग की जा रही है, बजरंग दल और विहिप पर प्रतिबन्ध लगाने के लिये जोर-शोर से गला फ़ाड़ा जा रहा है, चारों ओर यह माहौल तैयार करने की कोशिश जारी है कि मुस्लिम आतंकवाद नाम की कोई चीज़ नहीं होती या मिशनरी सिर्फ़ सेवा करती हैं, बाकी के लोग (यानी संघ परिवार) सिर्फ़ भड़काने में लगे हुए हैं। हो सकता है कि सोनिया को खुश करने के लिये शिवराज पाटिल और मनमोहन मिलकर उड़ीसा में राष्ट्रपति शासन लगा भी दें, आखिर सत्ता और पावर मैडम के हाथ में है, लेकिन कांग्रेस यह भूल न ही करे तो बेहतर होगा। पहले ही कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र और आंध्रप्रदेश यानी सिर्फ़ तीन बड़े राज्यों में सत्ता में है, कहीं अगले आम चुनाव में वह और भी सिमटकर क्षेत्रीय पार्टी न बन जाये। राष्ट्रपति शासन लगाने की यह माँग बेहद बचकाना इसलिये भी है कि जब 1993 में मुम्बई बम विस्फ़ोट हुए तब भी, और मुम्बई में ही सदी के सबसे भीषण दंगे हुए तब भी, महाराष्ट्र की सुधाकरराव नाईक सरकार को बर्खास्त नहीं किया गया था। जबकि कांग्रेसी लोग सत्ता के इतने लालची हैं कि सैयद सिब्ते रजी (झारखंड के खलनायक) और रोमेश भंडारी (उत्तरप्रदेश के खलनायक) जैसे राज्यपालों और गुलाम नबी आज़ाद जैसे गैर-जनाधारी नेता को पालते-पोसते हैं।
सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार केरल में 63 पादरियों पर मर्डर, बलात्कार, अवैध वसूली और हथियार रखने के मामले विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज हैं। केरल पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार पिछले सात वर्षों में दो पादरियों को हत्या के जुर्म में सजा मिल चुकी है, जबकि दस अन्य को “हत्या के प्रयास” की धाराओं में चार्जशीट किया गया है। माकपा का कैडर, नक्सली और चर्च ये तीनों मिलकर एक घातक “कॉम्बिनेशन” बनाते हैं। इसके लिये काफ़ी हद तक हमारे आस्तीन में पल रहे “सेकुलर” भी जिम्मेदार हैं। इन लोगों के आँखों पर “धर्मनिरपेक्षता” की ऐसी मजबूत पट्टी बँधी हुई है कि इन्हें यह भी दिखाई देना बन्द हो गया है कि देश का हित किसमें है, राष्ट्रवाद क्या है और देशद्रोह किसे कहते हैं। सेकुलर लोग धर्मान्तरण या मुस्लिम आतंकवाद को खतरा तभी मानेंगे जब यह उनके द्वार तक पहुँच जायेगा, और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।
सरकार को चाहिये कि सभी मिशनरियों के खातों की बारीकी से जाँच की जाये, उनके सम्बन्धों के बारे में खुफ़िया जानकारी एकत्रित की जाये और एक स्वतन्त्र जाँच एजेंसी से चर्च और नक्सलियों के आपसी अन्तर्सम्बन्धों पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की जाये। लेकिन सोनिया गाँधी के रहते यह सम्भव नहीं है, क्योंकि अपने उड़ीसा दौरे के समय राहुल गाँधी एक रात बगैर सुरक्षा एजेंसियों को बताये अचानक गायब हो गये थे और बाद में पता चला कि वे घने जंगलों में एक मिशनरी के कामकाज को देखने(???) चले गये थे, इसलिये जनता को ही जागरूक बनना होगा, चुनावों में वोट देने के लिये घर से निकलना होगा और कांग्रेस नाम के इस कैंसर को देश से हटाना होगा… हिन्दुओं के सब्र का इम्तहान लिया जा रहा है, अब देखना यही है कि यह बाँध कब फ़ूटता है, एक बार गुजरात में यह फ़ूट चुका है, लेकिन “सेकुलर” और कांग्रेसी उससे कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं…
इस बात के साफ़ सबूत हैं कि कुछ अन्तराष्ट्रीय ईसाई संस्थायें उत्तर-पूर्व के राज्यों में आतंकवाद को खुला समर्थन दे रही हैं, उनका मकसद है समूचे उत्तर-पूर्व को भारत से अलग करना। इन विभिन्न आतंकवादी संगठनों को चर्च की ओर से पैसा और हथियार मुहैया करवाये जा रहे हैं।
त्रिपुरा
इस राज्य में नेशनल लिबरेशन ऑफ़ त्रिपुरा (NFLT) की स्थापना दिसम्बर 1989 में हुई थी। अपने स्थापना के समय से ही इसे बैप्टिस्ट चर्च का खुला समर्थन हासिल है, हालांकि इस संगठन पर 1997 में प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, लेकिन इसकी गतिविधियाँ बांगलादेश से सतत जारी हैं। नोआपारा बैप्टिस्ट चर्च के सचिव नागमनलाल हालम को सीआरपीएफ़ द्वारा सन् 2000 में आतंकवादियों को सीमापार करवाने और 60 जिलेटिन की छड़ें रखने के आरोपों में गिरफ़्तार किया गया था। इसी चर्च के दो अन्य कर्मचारियों को NFLT को हथियार सप्लाई करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। हालम ने स्वीकार किया था कि वे NFLT के लिये हथियार खरीदने में बिचौलिये की भूमिका निभाते थे। एक और चर्च अधिकारी जतना कोलोई को भी NFLT के शिविर में गुरिल्ला प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिये गिरफ़्तार किया जा चुका है।
त्रिपुरा के जंगलों में आदिवासियों को जबरिया धर्मान्तरित करने का धंधा जोरशोर से चलता है। NFLT पर कई बार स्थानीय आदिवासियों ने आरोप लगाये हैं कि वह धर्मान्तरण के जरिये उनकी स्थानीय संस्कृति को खतरे में डाल रहा है, लेकिन दिल्ली की लूली-लंगड़ी सरकारों तथा त्रिपुरा के मार्क्सवादियों की शह पर यह काम धड़ल्ले से जारी रहा। अब स्थिति यह है कि वहाँ के स्थानीय लोग अल्पसंख्यक हो गये हैं और दुर्गापूजा जैसा वार्षिक त्यौहार भी वे शान्ति से नहीं मना पाते। NFLT के घोषणापत्र में कहा गया है कि वे त्रिपुरा में 'क्राईस्ट" का राज्य लाकर रहेंगे। जमातिया नाम का आदिवासी समुदाय अपने परम्परागत रूप से मार्च में भगवान "गादिया" की पूजा करता आया है, जिसे वे शिव का अवतार मानते हैं, लेकिन चर्च और आतंकवादियों ने यह पूजा क्रिसमस के दिन करने हेतु "आदेश" दिया है। इन आतंकवादी समूहों को ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैण्ड के बैप्टिस्ट चर्चों से भी लगातार पैसा मिलता है। जो भोले-भाले आदिवासी इनकी बात नहीं मानते, उनकी औरतों के साथ अपहरण और बलात्कार किया जाता है, और उन्हें ईसाई धर्म मानने पर मजबूर कर दिया जाता है, और जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य हिन्दू संगठन वहाँ काम करने जाते हैं, तो उन्हें धमकियाँ दी जाती हैं और उन पर जानलेवा आक्रमण किये जाते हैं। अगस्त 2000 में स्वामी शान्तिकलि महाराज की हत्या कर दी गई थी। इसी प्रकार दिसम्बर 2000 में जमातिया कबीले के मुख्य पुजारी लबकुमार जमातिया की भी हत्या की गई, उनका भी कसूर वही था जो कि लक्ष्मणानन्द सरस्वती का था, यानी कि हिन्दुओं को धर्मान्तरण के खिलाफ़ जागृत करना। सिर्फ़ सन 2001 में त्रिपुरा में कुल 826 आतंकवादी हमले हुए और जिसमें 405 लोग मारे गये और 481 आदिवासियों का अपहरण हुआ। 
नागालैण्ड
नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ़ नागालैण्ड (NSCN) के दो गुट हैं, दोनों ही गुट ईसाईयों द्वारा ही संचालित हैं और इन्हें वर्ल्ड काउंसिल ऑफ़ चर्चेस से आर्थिक मदद मिलती रहती है, चीन भी इन्हें हथियारों से मदद करता रहता है। NSCN के न्यूयॉर्क, जिनेवा और हेग में अपने ऑफ़िस हैं, जिस पर डिस्प्ले बोर्ड लगे हैं "पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ नागालैण्ड"। नागालैण्ड के इन दोनों आतंकवादी गुटों ने संयुक्त राष्ट्र में अब तक दो बार स्वतन्त्र नागालैण्ड की गुहार लगाई है। नागालैण्ड में इन दोनों गुटों की सरकार चलती है, वे लोगों से पैसा वसूलते हैं। भारत सरकार के कर्मचारियों की एक तिहाई तनख्वाह "नागालैण्ड टैक्स" के रूप में छीन ली जाती है। नागालैण्ड में अधिकतर सरकारी बैंक बन्द हो चुके हैं, क्योंकि उसमें से भारी धनराशि लूटी जा चुकी है। इन संगठनों के लेटरहेड पर लिखा हुआ है "नागालैण्ड फ़ॉर क्राईस्ट"। स्वतन्त्रता के बाद त्रिपुरा में ईसाईयों की संख्या नगण्य थी, जबकि आज 1,20,000 है, जो कि पिछली जनगणना (1991) के अनुसार 90% का उछाल है। अरुणाचल प्रदेश की स्थिति और भी भयावह है, उस राज्य में सन् 1961 में 1,710 ईसाई थे, लेकिन आज सिर्फ़ 40-45 सालों में बढ़कर एक करोड़ से ऊपर हो गये और चर्चों की संख्या हो गई है 780… आंध्रप्रदेश, जहाँ एक ईसाई मुख्यमंत्री हैं, में दूरदराज के इलाकों में रोज-ब-रोज एक नया चर्च खुलता है, क्या वाकई में ईसाई संस्थाएं इतनी समाजसेवा कर रही हैं? लेकिन यह सारी सूचनायें कांग्रेस सरकार और सेकुलरों के लिये या तो बेकार हैं या फ़िर "संघ का दुष्प्रचार" भर हैं।
लालच की हद तो यह है कि धर्मान्तरण होने के बाद चर्च से भारी आर्थिक मदद लेने के बावजूद ये "भगोड़े" लोग भारत सरकार से आरक्षण का लाभ लेने के लिये हल्ला करते हैं और सेकुलर लोग जो गरीबों के हमदर्द होने का दम भरते हैं, वास्तविक दलितों और पिछड़े वर्गों के हक मारकर इन्हें आरक्षण और अन्य सुविधायें दिलवाने की पैरवी करते रहते हैं, यानी धर्मान्तरित होने वाले को दोहरी मलाई मिलती है। चर्च भी इसमें अपना फ़ायदा देखते हुए इसका समर्थन करता है, जबकि असल में जो लोग धर्मान्तरित होकर ईसाई बनते हैं उनके लिये चर्च भी अलग होता है और उनसे दोहरा और अपमानजनक बर्ताव जारी रहता है, मूलरूप से ईसाई व्यक्ति इन्हें कभी भी दिल से स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। चर्च भी अपना "कथित भारतीयकरण" करने में लगा हुआ है, आजकल दलितों को धर्मान्तरण के बाद नाम बदलने पर जोर नहीं दिया जाता, दूरदराज के गाँवों में जहाँ बहुत ज्यादा अशिक्षा है, वहाँ पादरी गाँव में जाते हैं व अपने साथ यीशु की धातु की मूर्ति ले जाते हैं व भगवान की एक मूर्ति लकड़ी की भी ले जाते हैं, फ़िर दोनो को आग में डालते हैं, स्वाभाविक है कि भगवान की मूर्ति जल जाती है, लेकिन यीशु की मूर्ति सही-सलामत निकलती है, बस फ़िर भोले-भाले आदिवासियों का "ब्रेन-वॉश" करने में कितनी देर लगती है। हालांकि इस प्रकार के चमत्कार दिखाकर तो हिन्दुओं के बाबा भी अपनी दुकानदारियाँ चलाये हुए हैं, लेकिन यहाँ मामला साफ़-साफ़ देश की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। चर्च का भारतीयकरण करने के फ़ेर में आजकल छोटे-छोटे गाँवों में "फ़ादर" सफ़ेद की बजाय गेरुए अथवा पीले वस्त्र पहनने लगे हैं ताकि किसी को कोई शक न हो, लेकिन मौका मिलते ही वे अपने "असली रूप" में आ जाते हैं यानी कि भगवानों को भला-बुरा कहते हुए यीशु का गुणगान करना। यह स्थिति मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा धर्मान्तरण किये जाने से अधिक खतरनाक है, क्योंकि औरंगजेब जैसे मुस्लिम आक्रांता जब हिन्दुओं का धर्म परिवर्तित करवाते थे, तब नाम, भेष और रहन-सहन सभी बदलना पड़ता था, लेकिन ईसाई संस्थायें दलितों को ईसाई भी बना रही हैं और उनके नाम भी नहीं बदलतीं फ़िर धर्म परिवर्तन के बाद भी आरक्षण की बैसाखी मिलती रहती है, और असली गरीब दलितों (जिन्होंने धर्म परिवर्तन नहीं किया) का हक मारा जाता है…
शायद भारत ही विश्व एकमात्र ऐसा देश होगा जहाँ बहुसंख्यक आबादी को ही दबकर रहना पड़ता हो… लेकिन UPA की अध्यक्षा जब देश की सर्वेसर्वा हों, आस्तीन में सेकुलर बैठे हुए हों, मीडिया भी इनके साथ हो तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये…
सुरेश चिपलूनकर
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