इतिहास में पहली बार हमें ओलम्पिक में दो-चार पदक मिले हैं, जिसमें एक स्वर्ण भी है। निश्चित ही इस उपलब्धि पर समूचे देश को गर्व है। स्वर्ण पदक भले ही अभिनव बिन्द्रा ने अपने एकल प्रयासों से और पिता द्वारा हासिल आर्थिक सम्पन्नता के कारण हासिल किया हो, लेकिन कुश्ती के वीर सुशील कुमार और मुक्केबाज विजेन्दर पूर्णतः मध्यमवर्ग से आते हैं, इन्होंने बहुत आर्थिक संघर्षों के बाद यह मुकाम हासिल किया है। यह मात्र संयोग नहीं है कि जिन खेलों में भारत को पदक मिले हैं वह खेल आक्रामकता और एकाग्रता का सम्मिश्रण हैं।
भारत को स्वर्ण मिलते ही पाकिस्तान के एक नेता ने कहा भी था कि “भारत में निशानेबाजी जैसा आक्रामक खेल जानबूझकर सिखाया जा रहा है और भारत आक्रामक है ही…” ज़ाहिर है इस बयान को हँसी में उड़ा दिया जाना चाहिये। यह बयान एक कुंठित पाकिस्तानी का है, जिसका देश साथ में आज़ाद होने के बावजूद भारत से बहुत-बहुत पीछे रह गया है (हरेक मामले में)। पाकिस्तानियों का यह बयान उनकी धर्म-आधारित व्यवस्था के मद्देनज़र आया हो सकता है, जिसके कारण वे लोग कभी तरक्की नहीं कर पाये, लेकिन भारत की निगाह से देखें तो यह मात्र संयोग नहीं है। निशानेबाजी, कुश्ती और मुक्केबाजी तीनों खेल आक्रामकता, जीतने का जज़्बा और एकाग्रता मांगते हैं, और भारत का आज का युवा इन तीनों का मिश्रण बनकर उभर रहा है। निकम्मे, कामचोर और भ्रष्ट खेल अधिकारियों के बावजूद खिलाड़ी आगे आ रहे हैं। खुली अर्थव्यवस्था के कारण आज के युवा के पास अधिक मौके उपलब्ध हैं, वह धीरे-धीरे पिछली सदी की मानसिकता से बाहर निकल रहा है, सूचना क्रांति के कारण इस युवा को बरगलाना इतना आसान नहीं है। लेकिन साथ ही साथ यह युवा अब “जीत” को लेकर आक्रामक हो चला है, और यह एक शुभ संकेत है, और जब मैं “युवा” कह रहा हूँ, इसका मतलब सिर्फ़ शहरी या महानगरीय युवा नहीं होता, छोटे-छोटे कस्बों और नगरों से आत्मविश्वास से लबरेज़ युवक सामने आ रहे हैं, वे आँख में आँख मिलाकर बात करते हैं और हिन्दी बोलने में झेंपते नहीं हैं, उन्हें अब अन्याय और शोषण पसन्द नहीं है और वे सिर्फ़ और सिर्फ़ जीत चाहते हैं। क्या यह बदलाव तेजी से बदलते भारत का प्रतीक है? क्या अब हम “उड़ान” भरने को पूरी तरह तैयार हैं? मेरा जवाब होगा “हाँ”…। इस उभरते हुए “युवा विस्फ़ोट” को अब सही दिशा देने की ज़रूरत है, देश को सख्त आवश्यकता है एक युवा और ऊर्जावान नेतृत्व की, जो वर्तमान में कुर्सी पर काबिज “थकेले” नेताओं की जगह ले सके। ऐसे नेताओं से निज़ात पाने का वक्त आ चुका है जो कब्र में पैर लटकाये बैठे हैं लेकिन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हैं। ऐसे नेताओं को धकियाना होगा जो त्वरित निर्णय तक नहीं ले पाते और सोच-विचार में ही समय गुज़ार देते हैं, भले ही समय उन्हें पीछे छोड़कर आगे निकल चुका हो। विश्व के दूसरे नेताओं, उनकी फ़िटनेस, उनकी देशभक्ति की नीतियों (यानी मेरे देश को जिस बात से फ़ायदा हो वही सही है) को देखकर कई बार शर्म आती है, कि क्या “सिस्टम” बनाया है हमने!! देश की आबादी में 55% से अधिक संख्या 22-40 आयु वर्ग की है, और उन पर राज कर रहे हैं 75-80 वर्षीय नेता जो अपनी बूर्जुआ नीतियों को अभी भी ठीक मानते हैं। वही सड़े-गले नेता, वही एक परिवार, सदियों से चला आ रहा भ्रष्टाचार, नेताओं को अपने इशारे पर नचाती नौकरशाही, थके हुए कामचोर सरकारी कर्मचारी, सब कुछ बदलने की आवश्यकता है अब… 
देश के युवक अपने बूते पर सॉफ़्टवेयर के क्षेत्र में दुनिया पर परचम लहराये हुए हैं, IIT/IIM एक ब्राण्ड नेम बन चुका है, क्रिकेट में 20-20 विश्वकप जीता जा चुका है, कुश्ती और मुक्केबाजी में पदक भी आ चुका है, लेकिन हमारे भ्रष्ट नेता और मनमौजी अफ़सरशाह अभी भी सुधरने को तैयार नहीं हैं। हमारा युवा पिछड़ेपन को “जोर लगाकर पटकना” चाहता है, वह भ्रष्टाचार पर “मुक्कों” की बरसात करना चाहता है, उसका “निशाना” आर्थिक विकास पर सधा हुआ है, बस उसे ज़रूरत है एक सही युवा नेता की, जिसमें काम करने का अनुभव हो, दृष्टि खुली हुई हो, “भारत का हित” उसके लिये सर्वोपरि हो, जो भ्रष्टाचार से मुक्त हो, परिवारवाद से मुक्त हो, जो देश के गद्दारों को ठिकाने लगा सके, जो अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर “नये भारत की नई दहाड़” दिखा सके (बकरी की तरह मिमियाता न हो), जो चीन को आँख दिखा सके, जो बांग्लादेश को लतिया सके, जो पाकिस्तान को उसकी सही औकात दिखा सके, जो नई सदी में (जिसके 8 साल तो निकल चुके) भारत को सच्चे अर्थों में “महाशक्ति” बना सके… है कोई आपकी निगाह में?
और हाँ… खबरदार जो नरेन्द्र मोदी का नाम लिया तो… (हा हा हा हा हा………)
Suresh Chiplunkar
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
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