9 अगस्त अभी ही बीता है, 15 अगस्त भी आने वाला है। ये दो तारीखें भारत के स्वतन्त्रता इतिहास और लोकतन्त्र की लड़ाई के लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। 8 अगस्त को चीन में विश्व के सबसे खेल आयोजन “ओलम्पिक” का उद्घाटन समारोह हुआ। समूचे विश्व के प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति इस समारोह में शामिल हुए। लेकिन विश्व के सबसे बड़े लोकतन्त्र होने का दावा करने वाले, चीन के बाद दूसरी एशियाई महाशक्ति होने का दम भरने वाले, 125 करोड़ की विशाल आबादी और 60% “युवा” जनसंख्या वाले देश से प्रतिनिधित्व करने के लिये किसे बुलाया गया? प्रधानमंत्री को या राष्ट्रपति को? नहीं जी, दोनों को निमन्त्रण तक नहीं भेजा गया, बुलाया गया सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को। सोनिया गाँधी को UPA का अध्यक्ष (अर्थात प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति दोनों को नौकरी पर रखने की ताकत) होने के नाते और राहुल बाबा को शायद उनके पुत्र होने के नाते (और तो कोई खासियत फ़िलहाल नहीं दिखाई देती)। इनके साथ गये भारी-भरकम लाव-लश्कर, चमचे-लगुए-भगुए और खेल मंत्रालय के निकम्मे-मोटे अधिकारी, जिनकी लार टपक रही है 2010 में दिल्ली में होने वाले राष्ट्रमण्डल खेलों के बजट को देखते हुए।
वैसे तो यह प्रत्येक देश का अपना आंतरिक मामला है कि वह अपने यहाँ समारोह में किसे बुलाये या किसे न बुलाये। “प्रैक्टिकली” देखें तो चीन के रहनुमाओं ने एकदम सही निर्णय लिया कि सोनिया गाँधी को बुलाया जाये। जो व्यक्ति देश में सबसे अधिक “पावरफ़ुल” होता है सामान्यतः उसे ही ऐसे महत्वपूर्ण आयोजनों में बुलाया जाता है, ताकि आपसी सम्बन्ध मजबूत हों। यहाँ तक तो यह चीन का मामला है, लेकिन इसके आगे की बात भारत का अपना मामला है। हमारे देश में लोकतन्त्र है, सौ करोड़ लोगों द्वारा चुना गया एक प्रधानमंत्री है, एक मंत्रिमण्डल है, एक प्रणाली है। भारत के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति की (चाहे वह कैसा भी हो) न सिर्फ़ हमारे देश में बल्कि विदेशों में भी एक विशिष्ट इज्जत होती है, एक बना-बनाया “प्रोटोकॉल” होता है, जिसे निभाना प्रत्येक देश का कर्तव्य होता है। हम कोई ऐरे-गैरे नत्थू खैरे नहीं हैं, कि इतने बड़े देश की कोई सरेआम इज्जत उतारता रहे। लेकिन ऐसा हुआ है और लगातार हो रहा है। जब चीन ने बीजिंग ओलम्पिक के लिये सोनिया गाँधी को निमंत्रण भेजा था तो उस निमन्त्रण को आदर के साथ यह कहकर वापस किया जा सकता था कि या तो भारत के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को भी इसमें शामिल किया जाये या फ़िर इसे सधन्यवाद वापस माना जाये। 
निमन्त्रण पत्र मिलने और समारोह के बीच भी काफ़ी समय था, चीन के दूतावास के मार्फ़त और उच्च स्तरीय चैनल के माध्यम से यह संदेश भेजा जा सकता था कि आपने जो किया है वह अनुचित है और तत्काल “भूल-सुधार” किया जाये। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, जब भाजपा शुरुआत से कह रही थी कि मनमोहन तो एक “बबुआ प्रधानमंत्री” हैं, “एक नकली प्रधानमंत्री” हैं तब हमारा “सेकुलर” मीडिया भाजपा की आलोचना करता था कि वह देश और देश के प्रधानमंत्री की इज्जत खराब कर रही है। लेकिन अब सरेआम सारे विश्व के सामने चीन ने हमारे प्रधानमंत्री को उनकी “सही जगह” दिखा दी है तो कोई हल्ला नहीं? कोई विवाद नहीं? कोई आपत्ति नहीं कि आखिर इतने बड़े लोकतन्त्र का ऐसा अपमान क्यों किया जा रहा है? राहुल गाँधी को विश्व मंच पर एक नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करने की इस परिवार की यह योजना थी, जिसमें सोनिया सफ़ल हुई हैं। इतने बड़े आयोजन में जहाँ समूचे विश्व के मीडिया की आँखें नेताओं पर टिकी थीं, तब विश्व को पता चला कि भारत नाम के देश में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नाम की कोई चीज नहीं है, उनकी कोई औकात नहीं है, उन्हें बुलाया तक नहीं गया है, क्या इससे भारत का सम्मान दोगुना हो गया? लेकिन बात-बात पर बतंगड़ बनाने वाले कम्युनिस्ट (जो कि अब समर्थन वापस ले चुके हैं) भी खामोश हैं, क्योंकि यह उन्हीं की परम्परा है जहाँ पोलित ब्यूरो का महासचिव राज्य के मुख्यमंत्री से अधिक ताकतवर होता है और उसी को हर जगह बुलाया जाता है, और चीन जो कि उनका “मानसिक मालिक” है उसी ने यह हरकत की है तो “लाल बन्दरों” के मुँह में दही जमना स्वाभाविक है। लेकिन यदि किसी सरकारी कार्यक्रम में भाजपा के मुख्यमंत्री की जगह “सरसंघचालक” को बैठा दिया जाये तो फ़िर देखिये कैसे हमारे “धर्मनिरपेक्ष लंगूर” उछलकूद मचाते हैं, जिनका साथ देने के लिये “सेकुलर बुद्धिजीवी और सेकुलर मीडिया” नाम के दो नचैये सदैव तत्पर रहते हैं। पाँच करोड़ गुजरातियों द्वारा पूर्ण बहुमत से तीसरी बार चुने गये नरेन्द्र मोदी को अमेरिका की सरकार, वहाँ हल्ला मचा रहे मानवाधिकारवादियों(?) के दबाव में वीज़ा देने को तैयार नहीं है लेकिन “सेकुलर मीडिया” और हमारे माननीय प्रधानमंत्री दोनों ही एक मुख्यमंत्री के सार्वजनिक अपमान पर चुप्पी साधे हुए हैं, और क्यों साधे हुए हैं यह भी स्पष्ट हो गया है कि जब इन्हें “खुद के अपमान” की ही फ़िक्र नहीं है और इसके खिलाफ़ आवाज़ नहीं उठाते तो नरेन्द्र मोदी के पक्ष में क्या बोलेंगे? यह है हमारा असली राष्ट्रीय चरित्र और असली “सेकुलरिज़्म”!!! ज़रा एक बार किसी वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी को वीज़ा देने से मना करके देखो, या हवाई अड्डे पर किसी अमेरिकी मंत्री के कपड़े उतारकर तलाशी लेकर देखो, पता चल जायेगा कि “राष्ट्रीय स्वाभिमान” क्या होता है। क्या आत्मसम्मान भी कोई सिखाने की चीज़ होती है? 
कहने का तात्पर्य यही है कि अब इस देश में लोगों को देश के सम्मान और अपमान तक की फ़िक्र नहीं रह गई है। यही मीडिया, यही नेता, यही कार्पोरेट जगत (364 दिन छोड़कर) 15 अगस्त आते ही “देशभक्ति” की बासी कढ़ी पर पन्ने के पन्ने रंगेगा, लाउडस्पीकरों पर चिल्ला-चिल्लाकर दिमाग की पाव-भाजी बना देगा, लेकिन इनमें से एक ने भी उठकर चीन से यह नहीं कहा कि “ये लो अपना निमन्त्रण पत्र, हमें नहीं चाहिये, यह हमारे प्रधानमंत्री / राष्ट्रपति का अपमान तो है ही, सौ करोड़ लोगों का भी अपमान है… चीन वालों तुम्हारे निमन्त्रण पत्र की पुंगी बनाओ और…@#%^$&*(^%# ”, लेकिन यह बोलने के लिये दम-गुर्दे चाहिये होते हैं, रीढ़ की हड्डी मजबूत होना चाहिये, जो कि भ्रष्टाचार और अनाचार से खोखले हो चुके देश में नहीं बचे। ओलम्पिक की उदघाटन परेड में भारतीय दल की “यूनिफ़ॉर्म” तक में एकरूपता नहीं थी, तो राष्ट्र के प्रमुख मुद्दों पर एकता कहाँ से आयेगी, इसीलिये कोई भी आता है और हमें लतियाकर चलता बनता है, हम अपनी रोजी-रोटी में ही मस्त हैं, कमाने में लगे हैं, देश जाये भाड़ में। हाँ, 15 अगस्त को (यदि छुट्टी का दाँव नहीं लग पाया तो मजबूरी में) अपने ऑफ़िस में एक अदद झंडा फ़हराने पहुँच जायेंगे, जिसे देर शाम को बेचारा अकेला चौकीदार हौले से उतारेगा, तब तक तमाम अफ़सरान और बाबू थकान उतारने के लिये “नशे में टुन्न” हो चुके होंगे…
अभी तो 15 अगस्त मना लो भाईयों… “सेकुलरिज्म” और भ्रष्टाचार का यही हाल रहा तो हो सकता है कि सन् 2025 में एक अवैध बांग्लादेशी की नाजायज़ औलाद, भारत का प्रधानमंत्री बन जाये…
सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
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