धर्मनिरपेक्ष “भांड-गवैयों” की स्वयंभू मालकिन “महारानी” सोनिया गाँधी ने राजनाथ सिंह से फ़ोन पर जम्मू समस्या सुलझाने के लिये मदद हेतु बात की। सोनिया जी ने फ़रमाया कि “इस संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति नहीं होना चाहिये…” अहा !! कितने उच्च विचार हैं, बिलकुल “छँटे हुए” कांग्रेसियों की तरह। लेकिन क्या वे यह बतायेंगी कि “यह गंदी राजनीति शुरु किसने की है…” नहीं, नहीं… गुलाम नबी आजाद ने नहीं, वो तो सिर्फ़ एक “नौकर” है, उसकी इतनी हिम्मत नहीं है कि इतने गम्भीर मुद्दे पर वह सोच भी सके। असल में यह “कीड़ा” तो शाहबानो केस के फ़ैसले को उलटने के साथ ही भारतीय लोकतन्त्र के शरीर में घुस गया था, वही कीड़ा आज जब “कैंसर” बनकर लपलपा रहा है तो तमाम गाँधीवादियों और मानवाधिकारवादियों को जमाने भर के “लेक्चर” याद आने लगे हैं। “संयम रखना चाहिये…”, “बहकावे में नहीं आना चाहिये…”, “संवेदनशील मुद्दे पर राजनीति नहीं करना चाहिये…” आदि-आदि, और मजे की बात तो यह है कि ऐसे “लेक्चर” अक्सर हिन्दुओं को ही पिलाये जाते हैं। बहुसंख्यक हिन्दू भी महान प्रवचन सुन-सुनकर ढीठ टाइप के हो गये हैं। उन्हें मालूम रहता है कि बम विस्फ़ोट हुए हैं, “संयम बरतना है…”, हिन्दुओं का सामूहिक नरसंहार हुआ है, “धैर्य रखना है…”, अपने ही देश में रिफ़्यूजी बनकर दिल्ली में कैम्प में सड़ना है लेकिन विरोध नहीं करना है, गुजरात में ट्रेन में आग से कितने ही मासूम मारे जायें, उन्हें सहिष्णु बने रहना चाहिये… चाहे असम में कांग्रेस हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बनाने पर उतारू हो या उनके वामपंथी भाई अपने बांग्लादेशी भाइयों को गले लगा-लगा कर इस “धर्मशाला रूपी” देश में घुसाते जा रहे हों, “उसे तो हमेशा संयम ही बरतना है…” क्यों? क्योंकि हिन्दू धर्म महान है, यह सदियों पुराना धर्म है… आदि-आदि। इसी संयम की पराकाष्ठा अफ़ज़ल गुरु के रूप में हमारे सामने आ रही है, जहाँ सुप्रीम कोर्ट भी उसे सजा दे चुका है, लेकिन फ़िर भी कांग्रेसी अपने “दामाद” को फ़ाँसी देने को तैयार नहीं हैं। बस संयम रखे जाओ, गुलाब के फ़ूल भेंट किये जाओ, सत्याग्रह(?) किये जाओ, गरज यह कि बाकी सब कुछ करो, “कर्म” के अलावा, यह है खालिस बुद्धिजीवी निठल्ला चिन्तन। (इसलिये खबरदार… कोई मुझे बुद्धिजीवी न कहे, और “धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी” तो बिलकुल नहीं, और कोई भी गाली चलेगी)।
असल में जम्मू के युवक भी सचमुच गलती कर रहे हैं, उन्हें पुलिस या राज्य सरकार पर अपना गुस्सा सड़कों पर उतारने की क्या जरूरत है? जम्मू क्षेत्र में जितने भी पीडीपी के स्थानीय नेता हैं, उन्हें घर से निकालकर चौराहे पर लाकर जूते से मारना चाहिये, पीडीपी नाम की “फ़फ़ूंद” जम्मू क्षेत्र से ही हटा देना चाहिये। और फ़िर रह-रह कर एक खयाल आता है कि यह सब हम किन “अहसानफ़रामोशों” के लिये कर रहे हैं? जिस कश्मीर की जनता को साठ साल में भी समझ में नहीं आया कि भारत के साथ रहने में फ़ायदा है या पाकिस्तान के साथ, उन मूर्खों को जबरदस्ती अपने साथ जोड़े रखने के लिये इतनी मशक्कत क्यों? अलग होना चाहते हैं, कर दो अलग… जवाहर सुरंग से उधर का घाटी वाला हिस्सा (लद्दाख छोड़कर) आजाद कर दो। मेरा दावा है कि पाकिस्तान भी इस “अवैध संतान” को गोद लेने को तैयार नहीं होगा। 5-10 साल में ही “अलग होने” का रोमांटिक भूत(?) सिर से उतर जायेगा। सारी अरबों रुपयों की सरकारी मदद बन्द कर दो, सारी केन्द्रीय परियोजनायें बन्द कर दो, सारी सब्सिडी बन्द कर दो, सेना के जवान वापस बुला लो और कश्मीर में पीडीपी और हुर्रियत को तय करने दो कि प्रधानमंत्री कौन बने और सरकार कैसे चले… छोड़ दो उन्हें उनके हाल पर। यही तो चाहते हैं न वे? आखिर क्यों हम अपने करदाताओं की गाढ़ी कमाई कश्मीर नामक गढ्ढे में डाले जा रहे हैं? जिस प्रकार पंजाब में जनता ने खुद आतंकवाद को कुचल दिया था, उसी प्रकार कश्मीर की जनता को भी बहुत जल्दी समझ में आ जायेगा कि भारत और पाकिस्तान में कितना भारी अन्तर है। इसलिये हे जम्मू वालों जब भी तुम्हारे द्वार पर “ताली” बजाते हुए धर्मनिरपेक्षतावादी आयें तुम भी उनसे यही मांगो कि पिछले 60 साल में दोनों हाथों से जितना कश्मीर को दिया है उसका ज्यादा नहीं तो आधा ही हमें दे दो…
Suresh Chiplunkar
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