Nuclear Deal India America IAEA
समूचे देश में इस समय परमाणु करार को लेकर “बेकरार और तकरार” जारी है, यहाँ तक कि “निठल्ला चिंतन” भी कई लोग एक साथ कर रहे हैं। जहाँ एक ओर वामपंथी अपने पुरातनपंथी विचारों से चिपके हुए हैं और चार साल तक मजे लूटने के बाद अचानक इस सरकार में उन्हें खामियाँ दिखाई देने लगी हैं, तो दूसरी ओर भाजपा है, जो सोच रही है कि बढ़ती महंगाई, फ़टी-पुरानी पैबन्द लगी “धर्मनिरपेक्षता” और अब बैठे-ठाले सरकार गिरने का खतरा, यानी दोनो हाथों में लड्डू… रही देश की जनता, तो उसे इस सारी नौटंकी से कोई लेना-देना नहीं है, वह अपने रोजमर्रा के संघर्षों में जीवन-यापन कर रही है। जबकि बुद्धिजीवियों द्वारा अखबारों के पन्ने और ब्लॉगों के सर्वर भरे जा रहे हैं, भाई लोग लगे पड़े हैं रस्साकशी में…
इस सारे परिदृश्य में मूल मुद्दा धीरे-धीरे पीछे जा रहा है, जिस पर सबसे ज्यादा बहस होना चाहिये। वह मुद्दा है “भारत की तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतें कैसे पूरी होंगी? और इस सम्बन्ध में हमारी विदेश नीति क्या होना चाहिये?” भारत और चीन दो बढ़ती हुई आर्थिक महाशक्ति हैं, दोनों की सबसे बड़ी जरूरत है “ऊर्जा”। फ़िलहाल हम 1,20,000 मेगावाट का उत्पादन कर रहे हैं, जिसमें से 30% चोरी और क्षरण हो जाती है। अगले बीस साल में हमें चार लाख मेगावाट की आवश्यकता होगी, हर व्यक्ति अपने घर में दो-दो एसी लगवा रहा है, कम्प्यूटर खरीद रहा है, चार-चार टीवी हर घर में हैं, किसान भी मोटरों से खेतों में सिंचाई कर रहे हैं, उद्योग-धंधे तेजी से बढ़ रहे हैं… कहाँ से लायेंगे इतनी बिजली?
हरेक देश को अपने भविष्य और जनता के फ़ायदे के बारे में सोचने का पूरा हक है, भारत को भी है। भारत के पास थोरियम के विशाल भंडार मौजूद हैं। भारत के वैज्ञानिक थोरियम से रिएक्टर बनाकर बिजली बनाने की तकनीक पर काम कर रहे हैं (जो पूर्णतः सफ़ल होने पर भारत बिजली का निर्यात तक कर सकेगा)। थोरियम से बिजली बनाने की तकनीक के रास्ते में रोड़ा है पश्चिमी देशों से मिलने वाली आधुनिक तकनीक, विविध उपकरण और वैज्ञानिक मदद। हालांकि भारत के वैज्ञानिकों ने अपनी मेहनत और प्रतिभा के दम पर 350 मेगावाट का एक थोरियम रियेक्टर सफ़लतापूर्वक बना लिया है, लेकिन इस तकनीक में महारत हासिल करने के लिये और इसे व्यापक रूप देने के लिये वैज्ञानिकों को नई-नई तकनीक और उपकरण चाहिये होंगे, ताकि इस काम में तेजी लाई जा सके। यह सारी भूमिका इसलिये बाँधी, क्योंकि जो परमाणु समझौता हम अमेरिका से करने जा रहे हैं, उसका मुख्य फ़ायदा यही है कि अभी हमें यूरेनियम के लिये अमेरिका पर निर्भर रहना होता है, लेकिन इस समझौते से पूरा विश्व हमारे लिये खुला हुआ होगा, हम कहीं से भी यूरेनियम, संयंत्र और तकनीक खरीदने को स्वतन्त्र होंगे। इस परमाणु ऊर्जा से हम सिर्फ़ 4000 मेगावाट की बिजली ही पैदा कर पायेंगे, जो कि “ऊँट के मुँह में जीरे के समान” है, लेकिन इसके पीछे कलाम और काकोड़कर की सोच को राजनेता नहीं पहचान पा रहे।
इस समझौते के अनुसार, भारत में बिजली का निर्माण तीन चरणों में होगा, पहले चरण में यूरेनियम आधारित बिजली, दूसरे चरण में यूरेनियम विखण्डन (Explosion) आधारित बिजली तथा तीसरे चरण में थोरियम आधारित बिजली उत्पादन। अब परिदृश्य यह है कि भारत में यूरेनियम लगभग नगण्य है, इसलिये शुरुआत में हमें यह आयात करना पड़ेगा, उसके रिएक्टर भी बाहर से मंगवाने पड़ेंगे, लेकिन तीसरा चरण आते-आते भारत के वैज्ञानिकों को नवीनतम रिएक्टर तकनीक तो मिल ही जायेगी, साथ ही भारत में काफ़ी मात्रा में थोरियम मौजूद होने के कारण तब बिजली भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होने लगेगी। कलाम और काकोड़कर दोनो महान वैज्ञानिक हैं, उन्होंने इस परमाणु समझौते का गहन अध्ययन किया है, उन्हें पता है कि भारतीय वैज्ञानिकों को “वैश्विक अस्पृश्यता” से दूर करने के लिये यह समझौता बेहद जरूरी है। तात्कालिक रूप से प्राथमिक चरण में भारत को यह सौदा महंगा पड़ेगा, कारण यूरेनियम बेचने वाले, यूरेनियम के रिएक्टर बेचने वाले, उस पर निगरानी(?) करने में पश्चिमी देशों का एकाधिकार है, और सभी पश्चिमी देश पहले अपना हित / फ़ायदा देखते हैं। ऐसे में यदि भारत भी “सिर्फ़ अपना” फ़ायदा देखे तो इसमें हर्ज ही क्या है?
(भाग-2 में जारी…)
सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
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