सो, जब अगली बार कोई “सेकुलर” “प्रगतिशील” व्यक्ति आपसे पूछे कि भारत में इतनी गरीबी क्यों है? तब यह लेख उसके मुँह पर मारिये और बताइये कि क्योंकि हम भारतवासियों को “कश्मीर” नाम का नासूर पालने का शौक है, और हम कश्मीरी मुसलमानों को हर हालत में खुश देखना चाहते हैं (चाहे वे लोग हमें भूमि का छोटा सा टुकड़ा तक देने को राजी नहीं हैं)। जाहिर है कि उस “सेकुलर” का अगला सवाल यही होगा कि फ़िर हम कश्मीर को भारत से अलग क्यों नहीं कर देते? उसे आज़ाद क्यों नहीं कर देते? तो इसका जवाब है कि ऐसा निश्चित ही किया जा सकता है, लेकिन फ़िर कुछ ही वर्षों में समूचा उत्तर-पूर्व (सातों राज्य) और पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु भी भारत से अलग होने की माँग करने लगेंगे।
कश्मीर हमारे गले में फ़ँसा हुआ हड्डी का वह टुकड़ा है जो न निगलते बन रहा है न उगलते (महान सेकुलर नेहरू परिवार के सौजन्य से)। साठ वर्षों में कश्मीरी मुसलमानों ने क्या-क्या हासिल कर लिया है, देखते हैं…
1) अरबों-खरबों रुपये की केन्द्रीय मदद (जो हमारी-आपकी जेब से जा रही है)
2) कश्मीरी मुसलमान पूरे देश में कहीं भी सम्पत्ति खरीद सकता है, लेकिन एक भारतीय कश्मीर में नहीं।
3) हिन्दुओं का घाटी से पूर्ण सफ़ाया किया जा चुका है।
4) भारत सरकार के महत्वपूर्ण मंत्री और अफ़सर पदों पर कश्मीरी कब्जा किये हुए हैं।
5) भारत सरकार अपने जवानों को वहाँ उनकी रक्षा के लिये जान गँवाने को भेजती रहती है। सुरक्षा बल आतंकवादियों से लड़ते रहते हैं और कश्मीरी मुसलमान मजे करता है।
अब स्थिति यह है कि कश्मीरी चाहते हैं कि भारत सरकार उनकी आर्थिक मदद तो करती रहे लेकिन आतंकवादी और अलगाववादियों को खुला छोड़ दे। यह उनके लिये फ़ायदे का सौदा है, उन लोगों नें उनकी मदद से कश्मीरी पंडितों को वहाँ से पूरी तरह भगा दिया है और उनके मकानों, सम्पत्ति पर कब्जा कर लिया है, फ़िर भला वे क्यों चाहेंगे कि पंडित वापस लौटें (न ही फ़िलिस्तीन की चिंता करने वाले “महान सेकुलर” लोग इस बारे में कोई बात करेंगे)।
अब समय आ गया है कि निम्न बिन्दुओं पर गम्भीरता से विचार करें –
--- हम कश्मीर को बहुत-बहुत दे चुके, बस अब और नहीं। कश्मीरियों को साफ़-साफ़ बताने की आवश्यकता है कि हम आप पर क्या खर्च कर रहे हैं और उनके कर्तव्य क्या हैं।
--- इस लेख में बार-बार “कश्मीर” इसलिये कहा गया है कि जम्मू और लद्दाख शांतिप्रिय इलाके हैं (मुस्लिम जनसंख्या कम है ना इसलिये!!!), तो राज्य को तीन भागों में विभक्त कर दिया जाये। जो हिस्सा अधिक “रेवेन्यू” कमाकर केन्द्र सरकार को दे, उसे ज्यादा केन्द्रीय मदद मिलना चाहिये।
--- वक्त आ गया है कि कश्मीरी नेताओं से धारा 370 के बारे में दो टूक बात की जाये, न कि 1953 से पहले की स्थिति की मूर्खतापूर्ण बातें।
--- कश्मीरियों को भी बाकी भारत में किसी भी प्रकार की सम्पत्ति खरीदने पर रोक लगनी चाहिये।
1) कुल मिलाकर देखा जाये तो कश्मीर समस्या के हल दो ही प्रकार से हो सकते हैं, पहला तो यह कि कश्मीर में राष्ट्रपति शासन लागू करके आतंकवादियों के खिलाफ़ सीमापार तक खदेड़ने की नीति अपनाई जाये, आतंकवादियों को रगड़-रगड़ कर उन्हें घुटने के बल बैठा दिया जाये, जैसा कि गिल ने पंजाब में किया था, न तो पाकिस्तान की सुनी जाये, न अमेरिका की न ही किसी मानवाधिकारवादियों की… कुचलना ही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिये…लेकिन भारतीय सरकारों के “चरित्र”(?) को देखते हुए यह मुश्किल लगता है… (शर्म की बात तो है, लेकिन क्या करें)
2) दूसरा रास्ता है, जो कठिन है लेकिन इसके नतीजे “Long Term” में भारत के पक्ष में ही होंगे – कश्मीरी मुसलमान सदा से यह चाहते हैं कि कश्मीर में भारतीय सेना की संख्या में कटौती की जाये, उनकी यह इच्छा पूरी की जाये। हमारी सेना को धीरे-धीरे सीमा पर बारूदी सुरंगें लगाते हुए पीछे हटना चाहिये और कश्मीर से बाहर निकल आना चाहिये। इसका सीधा असर यह होगा कि तालिबान, अफ़गान और अल-कायदा के लोग कश्मीर में घुसपैठ कर जायेंगे, वे लोग चाहे कितना ही “शरीयत-शरीयत” भज लें, लेकिन वे अपहरण, लूट, बलात्कार से बाज नहीं आयेंगे, विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि बहुत जल्दी ही कश्मीर की जनता का उन “कथित जेहादियों” से मोहभंग हो जायेगा, फ़िर वे खुद ही भारत से मदद की गुहार लगाने लगेंगे, सेना को बुलायेंगे और “आज” के सुनहरे दिन याद करेंगे, उस वक्त हमारा काम आसान हो जायेगा। यदि ऐसा जल्दी नहीं भी होता है, तो निश्चित ही भारत की सेना हटने के बाद पाकिस्तान की दखलअंदाजी कश्मीर में बढ़ जायेगी, ऐसे में कश्मीर की जनता को जो “भारतीय लोकतंत्र” नाम का रसगुल्ला खाने की लत पड़ी हुई है, वह इतनी आसानी से पाकिस्तान के “नकली लोकतंत्र” को सहन नहीं कर पायेगी। वैसे भी तो हम इतना खर्चा करने और हजारों जानें गंवाने के बावजूद उनके दिल में भारत के प्रति प्रेम नहीं जगा सके हैं, फ़िर एक बार यह “जुआ” खेलने में हर्ज ही क्या है? कम से कम भारत के गरीबों और बच्चों की योजनाओं के लिये अरबों रुपया तो बचेगा, जो फ़िलहाल हम “अंधे कुएं” में डाल रहे हैं… इसलिये एक बार कुछ वर्षों के लिये कश्मीर को आजाद कर दो, उन्हें कोई मदद मत दो, सभी भारतीय कुछ वर्षों के लिये “अमरनाथ यात्रा” पर न जायें, कश्मीर में कोई भारतीय पर्यटक न जाये…।
निष्कर्ष - जब पेट पर लात पड़ेगी, तो अकल ठिकाने आने में देर नहीं लगेगी…
इन दो तरीकों के अलावा कोई और तरीका कामयाब होने वाला नहीं है, यदि होना होता, तो पिछले साठ वर्षों में हो गया होता… आपका क्या विचार है???
सुरेश चिपलूनकर
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