लगभग रोज ही किसी न किसी चैनल पर एक खबर अवश्य होती है कि दिल्ली, मुम्बई, चंडीगढ़, गुड़गाँव, पुणे, हैदराबाद आदि महानगरों में किसी कार ने फ़ुटपाथ पर सोये लोगों को कुचल दिया, किसी बाइक सवार ने किसी बूढ़े की जान ले ली आदि-आदि। हम धीरे-धीरे इन खबरों के भी “आदी”(?) होते जा रहे हैं, और इन घटनाओं में सलमान जैसे “सेलेब्रिटी(?)” तक शामिल हैं। ऐसी घटनाओं के तेजी से बढ़ने के पीछे मुख्य कारण है “युवाओं में बढ़ती शराबनोशी”। शराब अब समाज के लगभग 70% तबके में त्याज्य, या बुरी वस्तु नहीं मानी जाती, शादी-पार्टियों में तो अब यह आम हो चली है, ये बात और है कि शराब पीने और पीने के बाद की हरकतों की तमीज सिखाने का कोई इंस्टीट्यूट अभी तक नहीं खुला है। अक्सर देखने में आया है कि शराब पीकर कार या बाइक से कुचलने की घटनायें आमतौर पर शनिवार-रविवार को ज्यादा होती हैं। हालांकि अमीरजादों के लिये क्या वीक-एण्ड और क्या काम का दिन, लेकिन जब से बीपीओ का बूम आया है, सॉफ़्टवेयर, हवाई सेवाओं, व अन्य सभी इंडस्ट्री ने अनाप-शनाप पैसा युवाओं के हाथों में पहुँचाना शुरु किया है, धीरे-धीरे इन क्षेत्रों के युवा अमूमन शनिवार-रविवार को “मस्ती”, “एंजॉय”, “रिलैक्स” के नाम पर शराब या अन्य नशे की गिरफ़्त में होते हैं। इसकी शुरुआत होती है बीयर से और अन्त होता है हवालात में या सिर फ़टने के कारण हुई मौत में। रोड एक्सीडेंट के 40-45% मामलों में इसकी जिम्मेदार शराब ही होती है और उसमें भी 90% की उम्र 17 से 30 वर्ष होती है, इसका क्या मतलब निकाला जाये? शराब ही शायद एकमात्र ऐसी चीज है जो खुशी में भी पी जाती है और गम में भी, और कई बार टाइम-पास के लिये भी (विजय माल्या देखते-देखते विशाल एयरलाइन के मालिक यूँ ही नहीं बन गये हैं)।
बहरहाल, अक्सर देखने में आया है कि ऐसी घटनाओं में टक्कर मारकर घायल करने वाला, बल्कि जान लेने तक के मामले में ड्रायवर बच निकलता है। पहले या तो वह भाग जाता है, या पकड़ा जाये तो रिश्वत देकर छूटने की कोशिश करता है, या उसका कोई वैध-अवैध बाप थाने में आकर उसे छुड़ा ले जाता है। मान लो किसी तरह संघर्ष करके केस कोर्ट में चला जाये तो उसे सजा होगी मात्र दो साल की। जी हाँ, कानून के अनुसार एक तो यह जमानती अपराध है, और सजा अधिकतम दो साल की हो सकती है, चाहे उसने कितने ही लोगों को कुचलकर मार दिया हो।
सबसे पहला सुधार तो कानून आयोग की सिफ़ारिशों के अनुसार यही होना चाहिये कि अपराध गैर-जमानती हो (जैसे कि दहेज या दलित उत्पीड़न के मामले में है) और अपराध साबित होने के बाद सजा को बढ़ाकर दो साल की बजाय दस साल किया जाना चाहिये। दो-चार रईसजादे दस साल के लिये अन्दर हो जायें और उनके “पिछवाड़े” पर जेल में डंडे बरसाये जायें तो बाकी के 50% तो वह आलम देखकर गाड़ी चलाना ही छोड़ देंगे, बाकी के दारू पीना छोड़ देंगे और बचे-खुचे लोग “दारू और गाड़ी का कॉम्बिनेशन” नहीं करेंगे। ये तो हुआ पहला और जरूरी कदम। यदि टक्कर के बाद कोई व्यक्ति घायल हुआ है तो लायसेंस निरस्ती और/या भारी जुर्माना तो होना ही चाहिये लेकिन यदि व्यक्ति की जान गई है तब तो कम से कम दस साल की सजा होना ही चाहिये।
हालांकि भारत जैसे देश में कानून का पालन करवाना ही कठिन काम होता है, देश में सरेआम सड़कों पर 100 रुपये में कानून बिकता है, ड्रायविंग लायसेंस हमारे यहाँ घर बैठे बन जाते हैं (राशन कार्ड और पासपोर्ट भी), ऐसे में सबसे पहला काम शिक्षित करने का होना चाहिये, खासकर पालकों को जो अपने आठ-दस साल के नौनिहाल को स्कूटी या लूना चलाते देखकर गदगद हुए जाते हैं। ये नजारे आमतौर पर कालोनियों में देखे जा सकते हैं, सबसे पहले उन बच्चों के वाहन जब्त करके पालकों को “हिन्दी में समझाइश” देना होगा।
कानून में बदलाव के अलावा मेरा सुझाव है कि –
1) नशे में वाहन चलाते पाये जाने पर, गलत लेन या “नो एंट्री” में वाहन पकड़े जाने पर – जान से मारने की कोशिश का केस बनाये जायें
2) दूसरा महत्वपूर्ण सुझाव यह कि “जुर्माने” में से ट्रैफ़िक जवान को Incentive का प्रावधान होना चाहिये। मान लें कि “गलत पार्किंग”, “जेब्रा क्रॉसिंग पार करना”, “रेड लाइट होते हुए भी गाड़ी भगा ले जाना”, “लायसेंस-रोड टैक्स के कागजात न होना”, “गाड़ी चलाते हुए मोबाइल पर बात करने” जैसे छोटे अपराधों के लिये हमें “गाड़ी की कीमत” के हिसाब से 5% जुर्माना ठोंकना चाहिये और उस जुर्माना राशि में से 10-15% की रकम ट्रैफ़िक जवान को मिलना चाहिये। जैसे यदि किसी चार लाख की कार पर जुर्माना हुआ 20,000/- तो उसमें से 2000/- ट्रैफ़िक जवान का Incentive होगा, किसी 60,000 कीमत की बाइक पर जुर्माना 3000/- और उसमें से 300-500 रुपये ट्रैफ़िक जवान को मिलेंगे, तो ऐसे में भला वह क्यों 50-100 रुपये की रिश्वत लेकर किसी को छोड़ेगा? वह तो चाहेगा कि दिन भर में आठ-दस केस पकड़े और आराम से 5-7 हजार रुपये लेकर घर जाये। ऊपर से सरकार की प्रशंसा अलग से… देखते-देखते ट्रैफ़िक नियमों के प्रति जागरूकता फ़ैलेगी ऐसा मेरा विश्वास है।
भारत के अधिकांश लोग समझाइश से या शिक्षित होने भर से अनुशासन नहीं मानते, इन्हें “डंडा” ही ठीक कर सकता है (कुछ मामलों में “आपातकाल” इसका गवाह है)…
सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
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