आत्मपीड़ा और स्व-आलोचना का यदि कोई पैमाना मानें तो हिन्दुओं का स्थान उसमें विश्व में सबसे ऊपर आता है। विगत सौ वर्षों में खुद से घृणा करने की कला में हिन्दुओं ने महारत हासिल कर ली है। राजनेता, मीडिया, तथाकथित सेक्यूलर, बुद्धिजीवी(?), मानवाधिकार कार्यकर्ता ...
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