गंगा के सतत प्रवाह के लिये प्रयत्नशील कई आंदोलनकारियों में से एक हैं प्रोफ़ेसर जीडी अग्रवाल। प्रोफ़ेसर अग्रवाल की उम्र लगभग 80 वर्ष है, वे लगभग 20 वर्ष से चित्रकूट में रह रहे हैं। उन्होंने काफ़ी वर्षों तक आईआईटी कानपुर में पर्यावरण इंजीनियरिंग विषय को पढ़ाया, और वे कुछ वर्षों तक आईआईटी कानपुर के डीन भी रहे। उसके बाद केन्द्र सरकार के केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नई दिल्ली में “मेंबर सेक्रेटरी” भी रहे। उन्हीं के कार्यकाल में “वायु प्रदूषण कानून” को संसद द्वारा मंजूरी दी गई थी। 1999 से 2000 के दौरान नानाजी देशमुख के व्यक्तिगत आग्रह पर उन्होंने “ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट” में अवैतनिक अध्यापन कार्य किया। वे एक ऐसे अध्यापक रहे जिन्हें उनके छात्र आज भी श्रद्धा और आदर से याद करते हैं। उनके शिष्यों में, स्वर्गीय अनिल अग्रवाल (जिन्होंने सेंटर ऑफ़ साइंस एंड एनवायर्नमेंट की स्थापना की), एम सी मेहता (ख्यात पर्यावरणवादी वकील), श्री राजेन्द्र सिंह (भारत के पानी वाले बाबा) जैसे दिग्गज हैं। प्रोफ़ेसर अग्रवाल को पर्यावरण के साथ ही भारतीय संस्कृति और मूल्यों की गहरी समझ है। पर्यावरण पर मंडराते खतरों पर उनके विचार एकदम अलग और आँखें खोल देने वाले हैं। लाखों लोगों की तरह वे भी गंगा के बहाव को लेकर व्यथित हैं। जिस तरह से तमाम सरकारें और निजी ठेकेदार गंगा नदी के साथ सलूक कर रहे हैं वह दिल दुखाने वाला है, खासकर भागीरथी (जिसका ज्वलंत उदाहरण है टिहरी बाँध) जो कि कई जगह पोखरों में तब्दील होती जा रही है। कई बार तो हरिद्वार तक में पानी नहीं होता, जिसके कारण हिन्दुओं की आस्था पर गहरी चोट होती है। सावन के महीने (जुलाई-अगस्त) में जब लोग शिवजी के मंदिरों में अभिषेक के लिये हरिद्वार का गंगाजल लेने आयेंगे तो उसमें सभी जातियों के लोग शामिल होंगे और उनकी भी भावनायें आहत होंगी।
“आस्था और विश्वास ही फ़िलहाल देश की एकता के लिये सबसे मजबूत डोर हैं” लेकिन आजकल “आस्था” शब्द ठीक निगाह से नहीं देखा जाता। गंगा के प्रवाह के साथ जिस तरह से खिलवाड़ किया जा रहा है, उसके पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को लेकर वे दुखी हैं। बड़े बाँधों से पहले ही काफ़ी नुकसान हो चुका है, लेकिन उनका मानना है कि कम से कम गोमुख (गंगा के उद्गम स्थल) से लेकर उत्तरकाशी तक भागीरथी को प्रकृति के हवाले कर दिया जाये और इस क्षेत्र से मानव का हस्तक्षेप बिलकुल समाप्त कर दिया जाये। “विकास” की अवधारणा को लेकर ही मूल मतभेद हैं, लेकिन इस मामले में हमारी सभी राजनैतिक पार्टियाँ एकमत नजर आती हैं, इसलिये किसी की भी सरकार हो बाँधों और नदियों पर ऊटपटाँग निर्माण कार्य लगातार जारी रहते हैं।
इन परिस्थितियों के कारण प्रोफ़ेसर अग्रवाल ने 13 जून 2008 (गंगा दशहरा) से आमरण अनशन करने का संकल्प किया है। वे उत्तरकाशी में किसी नियत स्थान पर यह आमरण अनशन करेंगे। उन्होंने कुछ लोगों को पत्र लिखकर अपने इस निर्णय की सूचना दी है तथा पर्यावरण प्रेमी लोगों से अपील की है कि वे उनके लिये प्रार्थना करें ताकि वे अपनी माँगों पर सरकार का ध्यान आकृष्ट करवा सकें। प्रोफ़ेसर अग्रवाल कोई “पब्लिसिटी स्टंट” नहीं कर रहे हैं, न ही इसकी उन्हें आवश्यकता है। इस अनशन का निर्णय कोई अचानक नहीं हुआ, बल्कि इस निर्णय के पीछे गहन विचार मंथन है। “गंगा” सिर्फ़ पर्यावरण का मुद्दा नही है, वह इससे कहीं ज्यादा बढ़कर एक संस्कृति, एक जीवनशैली का प्रतीक है।
बहरहाल, हम दुआ करते हैं कि ऐसे बुजुर्ग विद्वान का यह आंदोलन सफ़ल हो तथा सरकारें कुछ अलग सोचें ताकि विकास भी हो और पर्यावरण को नुकसान भी न हो।
सुरेश चिपलूनकर
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
Dr. G.D. Agrawal, IIT Kanpur, Environment Problems, Ganga Environment, Haridwar, Uttarkashi, Tehari Dam, Pollution in Ganga River and Prof. Agrawal, Rajendra Singh, Nanaji Deshmukh, M.C. Mehta, Environment Issues, Blogging, Hindi Blogging, Hindi Blog and Hindi Typing, Hindi Blog History, Help for Hindi Blogging, Hindi Typing on Computers, Hindi Blog and Unicode

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