Welcome, Guest   [ Register | Sign In | Take a tour | Adult Filter: On ]

वास्तुशास्त्र, फ़ेंगशुई की अ-वैज्ञानिकता और


कमाल है, फ़ेंग शुई के बारे में नहीं जानते? सामने वाले का मतलब यह होता है कि “तुम्हारा जीवन तो व्यर्थ हो गया”। वैश्वीकरण की आँधी में सिर्फ़ वस्तुओं का आयात-निर्यात नहीं हुआ है, बल्कि उनसे जुड़ी संस्कृति, कल्पनायें और तकनीक भी आयात हुई है, वरना जब तक उस वस्तु का “विशिष्ट उपयोग” पता नहीं चलेगा “ग्राहक” उसे खरीदेगा कैसे? ड्राइंगरूम की शोभा बढ़ाने वाली पवनघंटियाँ, हँसते बुद्ध (नहीं “बुद्धा”) की मूर्ति, चीनी में कुछ लिखे हुए सिक्कों की माला, मछलीघर आदि को जब तक महिमामंडित नहीं किया जाता तब तक उसका बाजार तैयार कैसे होता…इसलिये वास्तुशास्त्र का “तोड़” या कहें कि “रिप्लेसमेंट”, या कहें कि “भरपाई” के तौर पर मीडिया में फ़ेंगशुई को उछाला गया, व्याख्यान दिये जाने लगे, सकारात्मक-नकारात्मक ऊर्जा आदि के बारे में “सेमिनार” आयोजित होने लगे…

फ़ेंगशुई क्या है?
जिनके घरों में ऊपर उल्लेखित वस्तुयें शोभायमान हैं असल में उन्हें भी नहीं पता कि फ़ेंगशुई क्या बला है? साधारण आदमी से पूछें तो कोई बतायेगा कि फ़ेंग शुई एक चीनी व्यक्ति का नाम है, कोई कहेगा कि फ़ेंगशुई एक धर्म है, एक पंथ है… आदि-आदि। जबकि असल में फ़ेंगशुई चीन का वास्तुशास्त्र है। फ़ेंग-शुई मतलब हवा और पानी। फ़ेंगशुई पाँच हजार साल पुरानी विद्या है ऐसा बताया जाता है। यह भी बताया जाता है कि फ़ेंगशुई “ऊर्जा” के संतुलन का विज्ञान है। मतलब जो कार्य भारतीय वास्तुशास्त्र बने-बनाये में तोड़-फ़ोड़ करके सिद्ध करता है, वह कार्य फ़ेंगशुई कुछ वस्तुएं इधर-उधर रखकर सिद्ध कर देता है, तात्पर्य यह कि जैसे कोई पदार्थ तीखा हो जाये तो हम उसमें नींबू मिलाकर उसका तीखापन कम करते हैं, उसी प्रकार फ़ेंगशुई “ऊर्जा” को संतुलित करता है।

वास्तुशास्त्र यानी इंडियन फ़ेंगशुई
अधिकतर तर्क यही होता है कि हमारा वास्तुशास्त्र भी अतिप्राचीन है, इस बात को कहने का अन्दाज यही होता है कि “मतलब एकदम असली है”, लगभग “स्कॉच” की तरह, जितनी पुरानी, उतनी अच्छी। लेकिन सवाल उठता है कि यदि हमारा वास्तुशास्त्र इतना ही प्राचीन है तो अचानक पिछले दस-पन्द्रह वर्षों में इसका चलन कैसे बढ़ गया? असल में मार्केटिंग मैनेजमेंट गुरुओं ने (जो अपनी मार्केटिंग और बाजार नियंत्रण की ताकत के चलते गंजे को कंघी भी बेच सकते हैं), ग्राहक की संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था आदि का अध्ययन करके अचूक मन पर वार करने वाला अस्त्र चलाया और लोग इसमें फ़ँसते चले गये। ये बात दोहराने की या किसी को बताने की जरूरत नहीं होती कि घर का पूर्वाभिमुख होना जरूरी है ताकि सूर्य प्रकाश भरपूर मिले, लेकिन एक बार जब किसी व्यक्ति के मन में शुभ-अशुभ, यश-अपयश, स्वास्थ्य आदि बातों का सम्बन्ध वास्तु से जोड़ दिया जाये तो फ़िर “धंधा” करने में आसानी होती है। ग्राहक सोचने लगता है कि “वास्तु में उपयुक्त बदलाव करने से यदि मेरी समस्याओं का हल होता है, तो क्या बुराई है, करके देखने में क्या हर्जा है?” यही मानसिकता तो वास्तुशास्त्र की सफ़लता(?) का असली राज है।

कुछ वर्षों पहले दारू पीने वाले को चाहे वह कितना ही प्रतिभाशाली हो, सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिलती थी, लेकिन अब यदि कोई दारू नहीं पीता तो उसे ही हेय दृष्टि से देखने का रिवाज है, दारू को भी प्रतिष्ठा, ग्लैमर मिल गया है (courtesy Vijay Malya)। ठीक यही वास्तुशास्त्र के साथ हुआ है। उच्चशिक्षित और नवधनाढ्य वर्ग यह कैसे बर्दाश्त कर सकता है कि कोई उसे वास्तुशास्त्र के कारण अंधविश्वासी और पिछड़ा कहे, इसलिये इस पर वैज्ञानिकता, आधुनिकता, सौन्दर्य, प्राचीनता, आध्यात्म, संस्कृति आदि का मुलम्मा चढ़ाया जाता है। अचानक बहुत सारा पैसा आ जाने वाले नवधनाढ्य वर्ग को वास्तुशास्त्र सिर्फ़ संकटों से डराने के लिये काम में लिया जाता तो यह उतना सफ़ल नहीं होता, लेकिन जब इसमें ग्लैमर भी जोड़ दिया, तो वह अदृश्य का “डर” भी “एन्जॉय” करता है। “वास्तु” में बदलाव करने के बावजूद यदि अपेक्षित “रिजल्ट” नहीं मिलता तो भी “पूर्वजन्म”, “पाप-पुण्य”, “कर्मों का लेख” आदि पतली गलियाँ मौजूद हैं जो लुटे हुए व्यक्ति के मन पर मरहम लगा देती हैं।

फ़ेंगशुई की लोकप्रियता के कारण-

किसी भी धार्मिक विधि-विधान को पूरी शास्त्रीय पद्धति और सम्पूर्ण सामग्री के साथ किया जाना आवश्यक होता है, लेकिन स्वाभाविक ही इसमें कई व्यावहारिक कठिनाईयाँ आती हैं, जैसे यदि गाँव में कोई पंडित कथा करने जाये और पूजाविधि के लिये किसान से रेशमी वस्त्र, इत्र, चन्दन, बादाम आदि मांगने लगे तो वह बेचारा कहाँ से लायेगा, या फ़िर पूजा के दौरान किसान की पत्नी से संस्कृत के कठिन शब्द “स्मृतिश्रृति”, “फ़लप्राप्त्यर्थम”, “आत्मना” आदि बोलने को कहे तो कैसे चलेगा? इसलिये इस प्रकार की धार्मिक विधियों के लिये भी “तोड़” निकाले गये, सुपारी को मूर्ति मान लिया गया, कोई भी धुला हुआ कपड़ा, धोती मान लिया गया, मिठाई के प्रसाद की बजाय गुड़ ही मान लिया गया…आदि। जाहिर है कि जब शातिर लोग कानून में “पतली गली” ढूँढ निकालते हैं तो धर्म में भी यह तो होना ही था। कालान्तर में यही “तोड़” या टोटके मूल विधि से ज्यादा कारगर माने जाने लगे। वास्तुशास्त्र के हिसाब से यदि बदलाव के लिये घरों में तोड़फ़ोड़ रोकना हो तो इस प्रकार की फ़ेंग-शुई वाली “पतली गलियाँ” बड़े काम की होती हैं।

दक्षिणाभिमुख मकान है, कोई बात नहीं फ़ेंगशुई में दक्षिण दिशा शुभ मानी जाती है, वास्तु की “काट” के तौर पर यह हाजिर है। आग्नेय दिशा भारतीय वास्तु के मुताबिक अग्नि की दिशा मानी जाती है, लेकिन फ़ेंगशुई के मुताबिक यह दिशा सम्पत्ति की होती है और “लकड़ी” उसका प्रतिनिधित्व करती है। कुछ-कुछ टोटके दोनों “शास्त्रों” में समान हैं जैसे, दरवाजे पर घोड़े की नाल लटकाना, टूटा शीशा न वापरना आदि। शादी में कोई अड़चन है, चीनी बतखों की जोड़ी, डबल हैप्पीनेस सिम्बॉल, फ़ीनिक्स पक्षियों की जोड़ी घर में रखो… सन्तानोत्पत्ति में कोई समस्या है तो गोद में बच्चा खिलाने वाला “लॉफ़िंग बुद्धा” रखो… ऐसे कई टोटके प्रचलित हैं। हाँ, ये बात जरूर है कि इनके लिये 200 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की कीमत चुकानी पड़ती है (कभी-कभी ज्यादा भी, क्योंकि धंधेबाज, माथा देखकर तिलक लगाता है, ज्यादा बड़ा माथा उतना बड़ा तिलक)।

वास्तु के अनुसार कोई बदलाव करना हो तो मूल निर्माण में फ़ेरबदल भी करना पड़ सकता है, लेकिन उसके निवारण के लिये फ़ेंगशुई हाजिर है, अच्छी-बुरी तमाम ऊर्जाओं का संतुलन इसके द्वारा किया जायेगा। मुसीबत में फ़ँसा व्यक्ति “मरता क्या न करता” की तर्ज पर फ़ेंगशुई के टोटके आजमाता चला जाता है और उसकी जेब ढीली होती जाती है। जो होना है वह तो होकर ही रहेगा, ये उपाय करके देखने में क्या हर्ज है…की मानसिकता तब तक ग्राहक की बन चुकी होती है। ज्योतिष की तरह वास्तु भी “गाजर की पुंगी” होती है, बजी तो ठीक नहीं तो खा लेंगे।

आजकल के “फ़ास्ट” युग में व्यक्ति जल्दी बोर हो जाता है, उसे विविधता, नवीनता चाहिये होती है, ग्लैमर सतत बना रहना चाहिये यह बात मार्केटिंग गुरु अच्छी तरह जानते हैं। इसीलिये जब टेस्ट मैच नीरस होने लगे, वन-डे आये और अब वन-डे के लिये भी समय नहीं बचा तो 20-20 क्रिकेट आ गया। भारतीय वास्तुशास्त्र लोगों को खर्चीला और बोर करने लगा था, उन्हें कोई “शॉर्टकट” चाहिये था, जिसकी पूर्ति के लिये फ़ेंगशुई हाजिर हुआ। ज्योतिषियों ने भी मौका साधा और वास्तुशास्त्र में फ़ेरबदल करके उसे “वास्तुज्योतिष” का एक नया नाम दे दिया। एक ही बात सभी के लिये शुभ या अशुभ कैसे हो सकती है, यदि किसी व्यक्ति की पत्रिका में “वास्तुसुख” ही नहीं है तो वह कितना भी शास्त्रोक्त विधि से मकान बनाये उसे शांति नहीं मिलेगी, यह घोषवाक्य नयेनवेले वास्तुज्योतिषियों ने बनाया। इसीलिये आजकल देखने में आया है कि जिस प्रकार स्टेशनरी के साथ कटलरी, किराने के साथ हार्डवेयर, एसटीडी के साथ झेरॉक्स, खेती के साथ मुर्गीपालन होता है ना… उसी प्रकार ज्योतिषी साथ-साथ वास्तु विशेषज्ञ भी होता ही है।

शिकागो में फ़ेंगशुई का प्रशिक्षण देने की एक संस्था है, जिसकी एक सेमिनार की फ़ीस 300 से 900 डॉलर तक होती है, उसमें “नकली” वास्तु और फ़ेंगशुई विशेषज्ञों से बचने की सलाह दी जाती है… कुल मिलाकर सारा खेल “माँग और आपूर्ति” के सिद्धांत पर टिका होता है। दुर्भाग्य यह है कि देश की अधिसंख्य जनता अंधविश्वासों की चपेट में है। जिस पढ़े-लिखे वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह समाज से कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करेगा, वही रोजाना नकली टीवी चैनलों पर आ रहे नाग-नागिन, भूत-प्रेत-चुड़ैल, पुनर्जन्म, बाबा, ओझा, झाड़-फ़ूँक के “चमत्कारों” को न सिर्फ़ गौर से देखता है, बल्कि उन पर विश्वास भी कर बैठता है।

जबकि जरूरत इस बात की है कि देश की राजधानी में एक गोलाकार इमारत में बैठे 525 गधों की अक्ल को ठिकाने लाने के लिये ही सही, तमाम वास्तुशास्त्री मिलकर एक बड़ा सा “लॉफ़िंग बुद्धा” (Laughing Buddha) वहाँ लगायें, वैसे भी 100 करोड़ से ज्यादा जनता “वीपिंग बुद्धू” (Weeping Buddhu) बनकर रह ही गई है…।

सादर सन्दर्भ : प्रकाश घाटपांडे, महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति, पुणे एवं साधना ट्रस्ट प्रकाशन

Please dont make Anonymous Comments.

Suresh Chiplunkar
http://sureshchiplunkar.blogspot.com
suresh.chiplunkar@gmail.com

प्रतिक्रियाएँ

Re: वास्तुशास्त्र, फ़ेंगशुई की अ-वैज्ञानिकता और
Very good commitment. I invite to read whose the blind with eyes. & think whats going on. India has already lots of mircle but "ghar ki murgi dal barabar" so we run here & there . OP Tiwari Ratlam
अस्वीकरण